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और ज़ाया ना होती

गर यूँ ही बेवजह से मिल जाते तुम एक शाम और ना ज़ाया होती.. महफिलें तो हर रोज़ लग जाती हैं एक नज़्म और ना ज़ाया होती.. आ जाते बिन बुलाए दरवाज़े पर एक याद ना ज़ाया होती.. हम ढूँढ़ते ना तुम्हें दिल-ए-मुज़्तर हुए फिर ये मेरी बेख़ुदी ज़ाया ना होती.. बड़े शौक़ से रखे हैं कुछ जाम बचा के, गर यूँ ही बेवजह मिल जाते तुम, भर के जाम गैरों के  ये साक़ी ना ज़ाया होती..  ये साक़ी ना ज़ाया होती.. Himadri 23 Nov 2019 @himmicious

ए वक्त ,तू गवाह है

ऐ वक्त, तू गवाह है.. कभी वो सजी हुई वैश्या सा बिछा है मेरे आगे.. और ये भी तूने देखा है, कैसै सुबह के सूरज सा जला है वो देखा है यह भी  बनारस के पाखंडी सा घूनी रमा और जो फिर हर रात वो गले में इतर, होंठ लाल कर एक नई कली मसलने चला.. देखा है तूने मुझे भी उसके सिर को रखा है गोद में एक माँ की तरह और परोसा है खुद को मैने भरे वॅक्षो से मेघ की तरह ए वक्त ,तू गवाह है वो बिछा है मेरे आगे, वेश्या की तरह.. मुड़ा ना वो, गुजरा जब मेरे  शामियाने से आगे, नज़रें बचा फिर भी गिरी उसकी निगाहें कनखियों से हमपर  के देख ना लूँ मैं कहीं उसके कुर्ते पर पड़े नयी कली के निशान.. मेरे खरीदार ने निभाये हैं किरदार कई, कभी मेरी तरह, कभी अपनी तरह... Himadri 05/01/2014 @himmicious